ग़ज़ल

तेरा साँई तुझमें , ज्यों पहुपन में बास। कस्तूरी का हिरन ज्यों , फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास॥

तेरा साँई तुझमें , ज्यों पहुपन में बास। कस्तूरी का हिरन ज्यों , फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास॥
कबीर· Ghazal· 5 shers

कबीर के ये दोहे ईश्वर को अपने भीतर ही खोजने का संदेश देते हैं, जैसे कस्तूरी मृग सुगंध के लिए बाहर भटकता है। ये भक्तिमय अभ्यासों, जैसे कथा-कीर्तन, को भवसागर पार करने का माध्यम बताते हैं और नश्वर शरीर का उपयोग संतों की सेवा या गोविंद के गुणगान में करने की सलाह देते हैं। मन की चंचलता और उसकी विशाल क्षमता का भी वर्णन है, जो कभी गहन धर्म की ओर प्रवृत्त होता है तो कभी विचलित हो जाता है।

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लिपि व अर्थ
1
तेरा साँई तुझमें , ज्यों पहुपन में बास। कस्तूरी का हिरन ज्यों , फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास॥
तुम्हारा साँई (ईश्वर) तुममें निवास करता है, जैसे पहुपन में बास। कस्तूरी का हिरण वैसे ही, बार-बार घास खोजता रहता है।
2
कथा-कीर्तन कुल विशे , भवसागर की नाव। कहत कबीरा या जगत में नाहि और उपाव॥
कथा-कीर्तन कुल विशे, भवसागर की नाव। कबीर कहते हैं कि इस जगत में और कोई उपाय नहीं।
3
कबिरा यह तन जात है , सके तो ठौर लगा। कै सेवा कर साधु की , कै गोविंद गुन गा॥
कबिरा, यह शरीर एक दिन नष्ट हो जाएगा, अगर आप इसके लिए कोई जगह ढूंढ सकें। साधु की सेवा या गोविंद के गुणगान में आप क्या सेवा कर सकते हैं?
4
तन बोहत मन काग है , लक्ष योजन उड़ जाय। कबहु के धर्म अगम दयी , कबहुं गगन समाय॥
शरीर बहुत है, मन काका है, लक्ष्य योजन उड़ जाए। कभी के धर्म अगम दायी, कभीं गगन समाय।
5
जहँ गाहक ता हूँ नहीं , जहाँ मैं गाहक नाँय। मूरख यह भरमत फिरे , पकड़ शब्द की छाँय॥ 99॥ कहता तो बहुत मिला , गहता मिला न कोय। सो कहता वह जान दे , जो नहिं गहता होय॥
जहाँ खरीदार नहीं है, मैं वहाँ नहीं हूँ। जहाँ मैं खरीदार नहीं हूँ, मैं वहाँ नहीं हूँ। यह मूर्ख भ्रम में भटकता है, शब्दों की छाया को पकड़ता है। जो बहुत कुछ कहता है, उसे कुछ नहीं मिलता। उसे वह कहना चाहिए जो उसके पास नहीं है।
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