ये उम्र-ए-इश्क़ यूँही क्या गँवाई जाती है — जिगर मुरादाबादी

ये उम्र-ए-इश्क़ यूँही क्या गँवाई जाती है हयात ज़िंदा हक़ीक़त बनाई जाती है

“Is this lifetime of love to be squandered so in vain? Life itself is forged into a living reality.”

— जिगर मुरादाबादी

अर्थ

क्या प्रेम की यह उम्र यूँ ही बेकार गँवा दी जाती है? ज़िंदगी को तो एक जीती-जागती हक़ीक़त बनाया जाता है।

विस्तार

शायर यहाँ बड़ी आत्मीयता से हमें झकझोरते हुए कहते हैं कि मोहब्बत का वक़्त सिर्फ़ ख़यालों और आहों में ज़ाया करने के लिए नहीं होता। इश्क़ की सच्ची तासीर तो यह है कि वह ज़िंदगी को बेमक़सद गुज़रने के बजाय एक जीती-जागती और अर्थपूर्ण हक़ीक़त में बदल दे। यह शेर हमें अपने जज़्बातों को निष्क्रिय न रखकर, ज़िंदगी को पूरे हौसले और संजीदगी से जीने की प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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