क्या क़यामत है कि इस दौर-ए-तरक़्क़ी में 'जिगर' आदमी से आदमी का हक़ अदा होता नहीं

“What a tragic fate, O Jigar, that in this age of great ascent, / Man fails to grant unto fellow man the simple rights he is owed.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

जिगर, यह कितनी बड़ी विडंबना या दुख की बात है कि विकास और तरक़्क़ी के इस युग में भी एक इंसान दूसरे इंसान का हक़ अदा नहीं कर पा रहा है।

विस्तार

जिगर मुरादाबादी इस शेर में आधुनिक दौर की सबसे कड़वी सच्चाई पर तंज कसते हैं कि इंसान ने विज्ञान और समृद्धि में तो कमाल की तरक्की कर ली है, पर इंसानियत के मोर्चे पर वह बुरी तरह पिछड़ गया है। दुनिया आगे बढ़ गई मगर दिल तंग हो गए, जहां हम एक-दूसरे के बुनियादी हक़, आदर और हमदर्दी को भी भूल चुके हैं। यह शेर हमें याद दिलाता है कि अगर हम साथी इंसान का दर्द न समझ सकें, तो हमारी सारी तरक्की बेमानी है।

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