जान दी कि हश्र तक मैं हूँ मिरी तन्हाइयाँ हाँ मुबारक फ़ुर्सत-ए-नज़्ज़ारा-ए-क़ातिल मुझे

“I gave up my life so that till Judgment Day it is only I and my solitudes; congratulations indeed to me on this endless leisure to gaze upon my slayer.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

मैंने अपनी जान इसलिए दे दी ताकि क़यामत तक सिर्फ़ मैं और मेरा अकेलापन रहे; मुझे अपने क़ातिल का दीदार करने की यह फ़ुर्सत मुबारक हो।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ ने अपनी जान इसलिए नहीं गँवाई कि वह थक गया था, बल्कि इसलिए ताकि दुनिया के सारे झमेलों से छूटकर हमेशा के लिए अपने महबूब के ध्यान में डूब सके। अब क़यामत तक उसके पास सिर्फ़ उसकी अपनी तन्हाई है, जिसमें वह बेरोकटोक अपने 'क़ातिल' यानी महबूब के तसव्वुर का दीदार कर सकता है। शायर बेहद दर्दभरी और मीठी चुटकी लेते हुए ख़ुद को मुबारकबाद दे रहा है कि उसने अपनी ज़िंदगी की क़ीमत चुकाकर महबूब को एकटक निहारने की असीमित फ़ुर्सत ख़रीद ली है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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