हाए क्या हो गया तबीअ'त को ग़म भी राहत-फ़ज़ा नहीं होता

“Alas, what has come over this disposition of mine? Even sorrow brings no soothing solace now.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

अफ़सोस, मेरी तबीयत को क्या हो गया है कि अब दुख और ग़म भी कोई राहत या सुकून नहीं पहुँचाता।

विस्तार

उर्दू शायरी में ग़म को अक्सर दिल का हमदर्द माना जाता है, क्योंकि दर्द आशिक़ को अहसास दिलाता है कि वह ज़िंदा है और यही दर्द एक अजीब सा सुकून भी देता है। मगर इस शे’र में शायर बेबसी के उस मोड़ पर आ पहुँचा है जहाँ दिल पूरी तरह सुन्न हो चुका है और तकलीफ़ भी कोई तसल्ली नहीं दे पा रही। यह उस ख़ौफ़नाक ख़ामोशी का इज़हार है जब इंसान ग़म की लज़्ज़त से भी महरूम हो जाता है और अंदर सिर्फ़ एक वीराना बचता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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