इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता

“Until by love thoroughly disgraced and undone, a man is of no real worth to anyone.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

जब तक इश्क़ इंसान को रुस्वा और बदनाम नहीं कर देता, तब तक वह किसी काम के लायक़ नहीं बनता।

विस्तार

शायर यहाँ एक बहुत गहरी बात बड़े अपनेपन से कह रहे हैं कि जब तक इंसान इश्क़ की आँच में तपकर अपनी झूठी इज़्ज़त और अहंकार को नहीं खो देता, तब तक वह अंदर से परिपक्व नहीं होता। उर्दू शायरी में 'रुसवाई' महज़ बदनामी नहीं, बल्कि रूह को तराशने की एक भट्टी है जो दिल के सारे खोखलेपन को पिघला देती है। जब कोई प्रेम में दुनियावी परवाह छोड़कर बेपरवाह होना सीखता है, तभी उसके भीतर वह संवेदनशीलता और गहराई पैदा होती है जो उसे सच मायने में एक काम का और मुकम्मल इंसान बनाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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