“Alas, now it is morning; Where's the chariot, where the guest, where the worship?”
हाए, अब सुबह हो गई है; रथ कहाँ है, अतिथि कहाँ है, और पूजन कहाँ है?
यह दोहा बड़े ही मार्मिक ढंग से एक पल की गहरी पहचान को दर्शाता है। "हाय, प्रभात अब; कहाँ रथ! कहाँ अतिथि! कहाँ पूजन!" यह एक नए दिन की शुरुआत, भोर के आने की बात करता है, लेकिन गहरे अफसोस के साथ। वक्ता उन चीज़ों की अनुपस्थिति पर खेद व्यक्त कर रहा है जिनकी शायद उम्मीद थी या जिनकी कामना की गई थी – रथ द्वारा एक भव्य आगमन, कोई प्रिय अतिथि, या पूजा जैसा कोई पवित्र कार्य। यह एक छूटे हुए अवसर, स्थगित आनंद, या अधूरे कार्य की भावना को जगाता है, जहाँ जीवंतता और पूर्णता की अपेक्षा थी, वहाँ एक खाली जगह छोड़ जाता है। यह 'जो हो सकता था' उसके लिए एक मीठी सी आह है।
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