दयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं है खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार होगा

“O dwellers of the Maghrib's grace, this abode of God is no marketplace; what you deem true will soon become worthless dust.”

— अल्लामा इक़बाल
अर्थ

दयार-ए-मग़रिब के निवासियों, यह ईश्वर का निवास स्थान है, कोई बाज़ार नहीं; जिसे तुम सच मान रहे हो, वह अब व्यर्थ साबित होगा।

विस्तार

यह शेर हमें दुनिया की नश्वरता और दिखावे से दूर रहने की सीख देता है। अल्लामा इकबाल साहब यहां कहते हैं कि जिसे आप अपना संसार समझते हैं, वह कोई बाज़ार नहीं है। और जो चीज़ें आपको आज बहुत सच्ची और मज़बूत लगती हैं, वक़्त आने पर उनका मान और मोल कम हो जाएगा। यह एक गहरा दर्शन है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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