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ग़ज़ल

ये पीरान-ए-कलीसा-ओ-हरम ऐ वा-ए-मजबूरी

ये पीरान-ए-कलीसा-ओ-हरम ऐ वा-ए-मजबूरी

यह ग़ज़ल एक गहन भावनात्मक यात्रा का वर्णन करती है, जिसमें कवि प्रेम, विवशता और आध्यात्मिक खोज के द्वंद्व को व्यक्त करता है। यह बताता है कि सच्चा यकीन और रहस्यमय अवस्थाएँ केवल समर्पण और हृदय की गहराई में पाई जाती हैं।

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1
ये पीरान-ए-कलीसा-ओ-हरम ऐ वा-ए-मजबूरी सिला इन की कद-ओ-काविश का है सीनों की बे-नूरी
ये पीरान-ए-कलीसा-ओ-हरम और मजबूरी की हवा, इन दोनों की कद-ओ-काविश के कारण सीनों में कोई रोशनी नहीं है।
2
यक़ीं पैदा कर ऐ नादाँ यक़ीं से हाथ आती है वो दरवेशी कि जिस के सामने झुकती है फ़ग़्फ़ूरी
हे नादान, यक़ीं पैदा कर, क्योंकि यक़ीं से ही हाथ आता है, उस दरवेशी के सामने जिसके सामने फ़ग़्फ़ूरी भी झुक जाती है।
3
कभी हैरत कभी मस्ती कभी आह-ए-सहर-गाही बदलता है हज़ारों रंग मेरा दर्द-ए-महजूरी
कभी आश्चर्य, कभी खुशी, कभी सुबह के समय की आह, मेरा परित्याग का दर्द हज़ारों रंगों में बदलता है।
4
हद-ए-इदराक से बाहर हैं बातें इश्क़ ओ मस्ती की समझ में इस क़दर आया कि दिल की मौत है दूरी
प्रेम और मदहोशी की बातें इंद्रियों की समझ से परे हैं; मैं उन्हें इतनी गहराई से समझा कि दूरी दिल की मौत जैसी लगती है।
5
वो अपने हुस्न की मस्ती से हैं मजबूर-ए-पैदाई मिरी आँखों की बीनाई में हैं असबाब-ए-मस्तूरी
वे अपने सौंदर्य के नशे से मजबूर-ए-पैदाई हैं, और मेरी आँखों की नज़रों में ही मस्ती का सार है।
6
कोई तक़दीर की मंतिक़ समझ सकता नहीं वर्ना न थे तुर्कान-ए-उस्मानी से कम तुर्कान-ए-तैमूरी
कोई तक़दीर का तर्क कोई नहीं समझ सकता, वरना तैमूरी साम्राज्य उस्मानी साम्राज्य से कम नहीं होता।
7
फ़क़ीरान-ए-हरम के हाथ 'इक़बाल' आ गया क्यूँकर मयस्सर मीर ओ सुल्ताँ को नहीं शाहीन-ए-काफ़ूरी
हरम के फ़कीरों के हाथों 'इक़बाल' आ गया क्योंकर। मीर और सुल्तान को नहीं काफ़ूरी का शाहीन।
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