“I heard that the Ottoman Turkish possesses the essence of joy, Who could recite for me this unusual verse of Iqbal?”
मैंने सुना है कि तुर्की-उस्मानी में सुखद रस है, पर ये अजीब शेर मुझे किसने सुनाया?
यह शेर दरअसल एक तरह का आत्म-संवादात्मक (self-referential) काव्य है। इक़बाल साहब यहां शायरी के 'स्वाद' या सार की बात कर रहे हैं, जिसकी तुलना उन्होंने उस्मानी तुर्कों की महान परंपरा से की है। जब वो पूछते हैं कि 'ये शेर-ए-ग़रीब किसने सुनाया?', तो वो सिर्फ सवाल नहीं पूछ रहे होते। वो न सिर्फ़ श्रोता को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि शायरी के मूल स्रोत पर भी एक गहरा सवाल खड़े कर रहे हैं। यह एक शानदार बौद्धिक खेल है!
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