मैं जानता हूँ जमाअत का हश्र क्या होगा
मसाइल-ए-नज़री में उलझ गया है ख़तीब
“I know what the gathering will be destined for, The orator is entangled in matters of sight.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
मैं जानता हूँ कि जमाअत का हश्र क्या होगा, पर ख़तीब मसाइल-ए-नज़री में उलझ गया है।
विस्तार
यह शेर एक बहुत गहरी बात कहता है। शायर बता रहे हैं कि उन्हें पता है कि समाज का जो हश्र होना है, उसका अंजाम क्या होगा। लेकिन ये जो ख़तीब हैं, ये इतने उलझ गए हैं कि सिर्फ़ सैद्धांतिक बातों, यानी कि बेकार की बहस में फँसे हुए हैं। यह एक तंज़ है, कि जब असली समस्या सामने है, तब लोग छोटी-छोटी बातों में उलझे रहते हैं।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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