ग़ज़ल

न आते हमें इस में तकरार क्या थी

न आते हमें इस में तकरार क्या थी

यह ग़ज़ल एक अनसुलझे प्रेम और भ्रमित करने वाले रिश्ते के बारे में है, जहाँ शायर पूछता है कि इस विवाद या टकराव का क्या कारण था। वह याद करता है कि कैसे वादे किए गए थे, और कैसे किसी ने सारे रहस्य खोल दिए। ग़ज़ल में यह सवाल उठाया गया है कि क्या यह सब महफ़िल में आशिक़ को ताना मारने जैसा था, या बस इनकार करने का एक तरीका था।

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लिपि व अर्थ
1
न आते हमें इस में तकरार क्या थी मगर वा'दा करते हुए आर क्या थी
हमें इस बात पर कोई झगड़ा नहीं था, पर किए गए वादे का क्या था?
2
तुम्हारे पयामी ने सब राज़ खोला ख़ता इस में बंदे की सरकार क्या थी
आपके संदेशवाहक ने सारे रहस्य खोल दिए, तो इसमें आपके प्रियजन की स्थिति में क्या गलती थी।
3
भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा तिरी आँख मस्ती में हुश्यार क्या थी
भरी महफ़िल में, मैंने अपने प्रियतम को पुकारा, हे! तुम्हारे नशीले मन में तुम्हारी आँखें कितनी चतुर थीं।
4
तअम्मुल तो था उन को आने में क़ासिद मगर ये बता तर्ज़-ए-इंकार क्या थी
तअम्मुल तो उन्हें आने का था, पर यह बताओ इनकार करने का तरीका क्या था।
5
खिंचे ख़ुद-बख़ुद जानिब-ए-तूर मूसा कशिश तेरी ऐ शौक़-ए-दीदार क्या थी
मैं स्वतः ही पर्वत तूर की ओर खिंचा चला गया। तेरी दीदार की चाहत (आकर्षण) क्या थी?
6
कहीं ज़िक्र रहता है 'इक़बाल' तेरा फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी
कहीं ज़िक्र रहता है 'इक़बाल' तेरा, जैसे तेरी बातों में कोई जादू था।
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