खिंचे ख़ुद-बख़ुद जानिब-ए-तूर मूसा कशिश तेरी ऐ शौक़-ए-दीदार क्या थी

“Towards the Mountain of Tur, I pulled myself by my own accord, / What was the pull of your desire to behold?”

— अल्लामा इक़बाल
अर्थ

मैं स्वतः ही पर्वत तूर की ओर खिंचा चला गया। तेरी दीदार की चाहत (आकर्षण) क्या थी?

विस्तार

यह शेर उस अलौकिक खिंचाव, उस रूहानी कशिश के बारे में है जिसे हम अक्सर महसूस करते हैं। शायर सवाल कर रहे हैं कि वह कौन सी चाहत थी, कौन सा जुनून था, जो हमें तूर पर्वत की ओर खींच लाया। यह सिर्फ इश्क़ की बात नहीं है, बल्कि उस अदृश्य ताकत की बात है जो हमें अपने मुक़द्दर से, या किसी नज़ारे से, बांध लेती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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