फ़क़ीह-ए-शहर की तहक़ीर क्या मजाल मिरी — अल्लामा इक़बाल

फ़क़ीह-ए-शहर की तहक़ीर क्या मजाल मिरी मगर ये बात कि मैं ढूँडता हूँ दिल की कुशाद

“What is the power of the city's scholar to belittle me? But it is this that I search for, the heart's open secret.”

— अल्लामा इक़बाल

अर्थ

शहर के विद्वान का मुझे नीचा दिखाना क्या ताकत है? लेकिन मैं तो दिल का खुला रहस्य ढूँढता हूँ।

विस्तार

यह शेर एक बहुत ही गहरे फ़र्क़ को समझाता है। शायर कहते हैं कि शहर के विद्वान, या कोई भी ज्ञानी व्यक्ति, मुझे अपमानित करने की हिम्मत नहीं कर सकता। उनकी बातों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन असली खोज तो कहीं और है... वो है दिल की वो अवस्था, जो पूरी तरह से खुली हो, जो निश्छल हो। यह बाहरी दुनिया से ज़्यादा, अंदरूनी सुकून की बात है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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