मय-ए-यक़ीं से ज़मीर-ए-हयात है पुर-सोज़ — अल्लामा इक़बाल
मय-ए-यक़ीं से ज़मीर-ए-हयात है पुर-सोज़
नसीब-ए-मदरसा या रब ये आब-ए-आतिश-नाक
“From the wine of certainty, the conscience of life is ablaze, O Lord, grant this destiny, this water of fire.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
यकीन के मय से जीवन की आत्मा जल रही है, ऐ रब, इस विद्यालय के नसीब को आतिश के जल जैसा कर दे।
विस्तार
यह शेर हमें ज़िंदगी की दो बड़ी सच्चाइयों से रूबरू कराता है। शायर कहते हैं कि यक़ीन (faith) से ही हमारी ज़िन्दगी में जान है, लेकिन ये जो नसीब है.... ये तो आतिश की तरह जलता हुआ है! यह कितना गहरा विचार है कि हमारी सबसे बड़ी आस्था भी, कभी-कभी नियति के इस जलते हुए अहसास से टकरा जाती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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