बे-ज़ौक़-ए-नुमूद ज़िंदगी मौत — अल्लामा इक़बाल
बे-ज़ौक़-ए-नुमूद ज़िंदगी मौत
तामीर-ए-ख़ुदी में है ख़ुदाई
“A life devoid of taste and beauty, death In building the self, there resides divinity.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
बे-ज़ौक़-ए-नुमूद ज़िंदगी मौत, और तमीर-ए-ख़ुदी में है ख़ुदाई।
विस्तार
यह शेर इक़बाल साहब की फ़लसफ़े की नींव है। शायर कहते हैं कि अगर ज़िंदगी में किसी जुनून या मकसद का ज़ायका न हो, तो वो मौत से कम नहीं है। असली ज़िंदगी तो अपनी 'ख़ुदी' को तराशने में है। अपनी पहचान को मज़बूत करना, अपनी कला को निखारना... यही तो इबादत है। यह शेर हमें बताता है कि हमें सिर्फ़ जीना नहीं है, बल्कि एक मकसद के साथ जीना है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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