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क्या अजब मेरी नवा-हा-ए-सहर-गाही से ज़िंदा हो जाए वो आतिश जो तिरी ख़ाक में है

How strange, from the fresh breeze of dawn, can that fire become alive which lies in your ashes?

अल्लामा इक़बाल
अर्थ

क्या अजीब है कि सुबह की ताज़ी हवा से वह आग कैसे ज़िंदा हो जाए जो तुम्हारे राख में पड़ी है।

विस्तार

यह शेर यादों की उस अजीबोगरीब ताक़त को बयान करता है। शायर पूछते हैं कि क्या सुबह की नई, कोमल रौशनी से भी वो आग फिर जल उठेगी, जो तो आपके ख़ाक में बुझ चुकी है। यह एक ऐसा दर्द है, जो हमें बार-बार याद दिलाता है कि कुछ एहसास कभी पूरी तरह से मरते नहीं।

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