ख़तर-पसंद तबीअत को साज़गार नहीं
वो गुल्सिताँ कि जहाँ घात में न हो सय्याद
“A nature that loves danger cannot be adorned, It is a garden where the poet's craft is not in peril.”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
खतर-पसंद स्वभाव को सजाया नहीं जा सकता, वह बाग़ जहाँ शायर की कला खतरे में न हो।
विस्तार
यह शेर ज़िंदगी के एक बहुत गहरे सच को बयां करता है। शायर कह रहे हैं कि जिस दिल में ख़तर (जोखिम) को महबूब होता है, उसे किसी ऐसे माहौल में सजाया नहीं जा सकता जहाँ कोई चुनौती न हो। ज़िंदगी को महकने के लिए, उसमें थोड़ी सी आग, थोड़ी सी बेचैनी... ज़रूरी है। क्योंकि सिर्फ़ सुरक्षा में रहने से, रूह ज़िंदा नहीं रह पाती।
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