ग़ज़ल
आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं
आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं
क्या यह संसार, धूल और नश्वरता का अस्तित्व है, या तुम्हारा रहस्यमय रूप है? क्या वह जो आँखों से ओझल है, वह तुम्हारा संसार है, या मेरा? यह ग़ज़ल जीवन के विभिन्न पहलुओं—जैसे दर्द, उदासी, दिन और रात—के स्रोत पर सवाल उठाती है, यह पूछती है कि क्या ये सब तुम हो या मैं।
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1
आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं
वो जो नज़र से है निहाँ उस का जहाँ है तू कि मैं
क्या पानी, मिट्टी और हवा का यह संसार तुम्हारा या मेरा प्रकट रहस्य है? वह जो आँखों से ओझल है, क्या उसका प्रतिबिंब तुम हो या मैं?
2
वो शब-ए-दर्द-ओ-सोज़-ओ-ग़म कहते हैं ज़िंदगी जिसे
उस की सहर है तू कि मैं उस की अज़ाँ है तू कि मैं
जिसे लोग ज़िंदगी कहते हैं, वह असल में दर्द और ग़म की एक रात है। कवि पूछता है कि उस रात की सुबह तुम हो या मैं, और उसकी अज़ान कौन है?
3
किस की नुमूद के लिए शाम ओ सहर हैं गर्म-ए-सैर
शाना-ए-रोज़गार पर बार-ए-गिराँ है तू कि मैं
सुबह और शाम किसकी नुमाइश के लिए निरंतर गतिशील हैं? इस ज़माने के कंधे पर तुम एक भारी बोझ हो या फिर मैं?
4
तू कफ़-ए-ख़ाक ओ बे-बसर मैं कफ़-ए-ख़ाक ओ ख़ुद-निगर
किश्त-ए-वजूद के लिए आब-ए-रवाँ है तू कि मैं
तुम बिना दृष्टि वाली मुट्ठी भर धूल हो जबकि मैं स्वयं को देखने वाली मुट्ठी भर धूल हूँ। अस्तित्व की इस खेती के लिए बहता हुआ पानी तुम हो या मैं?
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