तू कफ़-ए-ख़ाक ओ बे-बसर मैं कफ़-ए-ख़ाक ओ ख़ुद-निगर
किश्त-ए-वजूद के लिए आब-ए-रवाँ है तू कि मैं
“O dust-cup, and I, who am aimless, O dust-cup and self-observer, Are you the flowing water, or am I, for the sake of existence?”
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ
तुम बिना दृष्टि वाली मुट्ठी भर धूल हो जबकि मैं स्वयं को देखने वाली मुट्ठी भर धूल हूँ। अस्तित्व की इस खेती के लिए बहता हुआ पानी तुम हो या मैं?
विस्तार
यह शेर हमें अस्तित्व के गहरे फ़लसफ़े से रूबरू कराता है। शायर कहते हैं कि इंसान दो तरह का होता है—एक जो बस 'कफ़-ए-ख़ाक' है, यानी बे-मकसद और बे-बसर; और दूसरा जो 'ख़ुद-निगर' है, यानी खुद को जानने वाला। ये शेर पूछते हैं कि जीवन की इस लंबी यात्रा में, जो बहता हुआ पानी है, वो स्रोत कहाँ है? क्या वो किसी और में है, या हमें खुद के अंदर खोजना होगा?
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