कफ़-ए-अफ़सोस मलवाती है तेरी पाक-दामानी — ख़्वाजा हैदर अली आतिश

कफ़-ए-अफ़सोस मलवाती है तेरी पाक-दामानी नचाकर शाहिद-ए-इस्मत को जामा पारसाई का

“Your immaculate purity makes us wring our hands in regret, Having made the maiden of chastity dance in the garb of piety.”

— ख़्वाजा हैदर अली आतिश

अर्थ

तेरी पवित्रता हमें पछतावे में हाथ मलने पर मजबूर कर देती है, क्योंकि तूने इस्मत की सुंदरी को पारसाई के लिबास में नचा दिया।

विस्तार

यह शेर पवित्रता के भीतर छुपे एक सूक्ष्म घमंड की ओर इशारा करता है। शायर कहता है कि तेरी अपनी पाकदामनी ही तुझसे अफ़सोस में हाथ मलवाती है। क्यों? क्योंकि तू मासूमियत की ख़ूबसूरत छवि को परहेज़गारी का लिबास पहनाकर दिखावे के लिए नचाता है। यानी जब नेकी एक तमाशा बन जाती है, तो उसकी असली शालीनता खो जाती है। सच्ची पवित्रता तो चुपचाप और सहज होती है। जिस पल तू उसका ढोल पीटे, उस पर इतराए, या उससे ख़ुद को बड़ा समझे, उसी पल तू उसे धोखा देता है। इसलिए यह पछतावा ख़ुद का पैदा किया हुआ है। शायर याद दिलाता है कि असली मासूमियत को न कोई लिबास चाहिए, न कोई मंच।

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