ग़ज़ल

ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

زمانہ سخت کم آزار ہے بہ جان اسد
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 8 shers· radif: हैं

यह ग़ज़ल असद (ग़ालिब) द्वारा रचित है, जिसमें दुनिया को अपेक्षा से कम कष्टदायक बताया गया है, लेकिन कवि अधिक कठिनाइयों के लिए तैयार रहने का संकेत देते हैं। यह सांसारिक इच्छाओं से अनासक्ति, अच्छाई-बुराई की जटिलताओं के बीच सादगी बनाए रखने, और विनम्रतापूर्वक हृदय के बोझ को खुले दिल से स्वीकार करने वाले जीवन को चित्रित करती है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद वगर्ना हम तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं
ऐ असद की जान की क़सम, ज़माना बहुत कम दुख देने वाला है; वरना हमारी अपेक्षाएँ तो इससे कहीं ज़्यादा होतीं।
2
तन-ए-ब-बंद-ए-हवस दर नदादा रखते हैं दिल-ए-ज़-कार-ए-जहाँ ऊफ़्तादा रखते हैं
हम अपने तन को हवस के बंधनों में बँधने नहीं देते और अपने दिल को दुनियावी मामलों से अलग रखते हैं।
3
तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं
बुरे और अच्छे में अंतर करने में लाखों बातें हैं; लेकिन, आईने के विपरीत, हम एक सादा व्यक्ति बनाए रखते हैं।
4
ब-रंग-ए-साया हमें बंदगी में है तस्लीम कि दाग़-ए-दिल ब-जाबीन-ए-कुशादा रखते हैं
हम परछाई की तरह बंदगी में विनीत हैं, क्योंकि हम दिल के घाव को खुले माथे पर रखते हैं।
5
ब-ज़ाहिदाँ रग-ए-गर्दन है रिश्ता-ए-ज़ुन्नार सर-ए-ब-पा-ए-बुत-ए-ना-निहादा रखते हैं
तपस्वियों के लिए गर्दन की नस उनका जनेऊ है। हम अपने सिर उन मूर्तियों के चरणों में रखते हैं जो अभी तक बनी नहीं हैं।
6
मुआफ़-ए-बे-हुदा-गोई हैं नासेहान-ए-अज़ीज़ दिल-ए-ब-दस्त-ए-निगारे नदादा रखते हैं
मेरे प्यारे उपदेशक अपनी व्यर्थ की बातों के लिए क्षमा के पात्र हैं, क्योंकि उन्होंने कभी अपना दिल किसी महबूब के हाथों में नहीं सौंपा है।
7
ब-रंग-ए-सब्ज़ा अज़ीज़ान-ए-बद-ज़बान यक-दस्त हज़ार तेग़-ए-ब-ज़हर-आब-दादा रखते हैं
हरे घास की तरह दिखने वाले बदज़ुबान प्रियजन, एक साथ मिलकर हज़ार ज़हर बुझी तलवारें रखते हैं।
8
अदब ने सौंपी हमें सुर्मा-साइ-ए-हैरत ज़बान-ए-बस्ता-ओ-चश्म-ए-कुशादा रखते हैं
अदब ने हमें हैरत का सुरमा सौंपा है। हम अपनी ज़बान को खामोश और अपनी आँखों को खुला रखते हैं।
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