याद हैं 'ग़ालिब' तुझे वो दिन कि वज्द-ए-ज़ौक़ में ज़ख़्म से गिरता तो मैं पलकों से चुनता था नमक

“Do you remember those days, Ghalib, when in the ecstasy of passion, / If salt fell from the wound, I would gather it with my eyelashes?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

ऐ ग़ालिब, क्या तुम्हें वो दिन याद हैं जब दीवानगी और शौक़ की मस्ती में, अगर ज़ख़्म से नमक गिरता था तो मैं उसे अपनी पलकों से चुन लेता था?

विस्तार

ग़ालिब अपने बीते दिनों को याद कर रहे हैं जब वो इश्क़ के ऐसे बेपरवाह जुनून में थे कि दर्द ही उनके लिए सबसे बड़ा आनंद बन चुका था। यूँ तो ज़ख़्म पर नमक का पड़ना असहनीय टीस पैदा करता है, मगर उस दीवानगी के आलम में अगर ज़ख़्म से नमक का एक ज़र्रा भी नीचे गिरता, तो आशिक़ उसे अपनी पलकों से बड़े नाज़ से सहेज लेता था। यह शेर मोहब्बत में दर्द की उस अनोखी लज़्ज़त को बयां करता है, जहाँ महबूब का दिया हर घाव और तकलीफ़ किसी नेमत की तरह पूजी जाती है।

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