“I shall not beg of another to multiply my pain; / Like the slayer's mocking smile, my wound is all salt from head to toe.”
मैं अपना दर्द बढ़ाने के लिए किसी ग़ैर की मिन्नत नहीं करूँगा; क़ातिल की मुस्कान की तरह मेरा ज़ख़्म तो सिर से पाँव तक ख़ुद ही नमक से भरा हुआ है।
मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ अपने दर्द में भी एक अनोखा स्वाभिमान दिखाते हैं कि अपनी तकलीफ़ को बढ़ाने के लिए वे किसी पराए के आगे हाथ नहीं फैलाएँगे। उन्होंने बेहद ख़ूबसूरत रूपक बाँधा है—क़ातिल महबूब की बेरहम मुस्कान में चमकते सफ़ेद दाँत मानो नमक की तरह हैं, जो आशिक़ के ज़ख़्मों को सर से पाँव तक झुलसा रहे हैं। इसका मतलब यह है कि महबूब की एक ज़हरीली हँसी ही इतना दर्द देने के लिए काफ़ी है कि अब किसी और के सितम की कोई ज़रूरत ही नहीं बची।
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