“That they have graced my home is a miracle divine; now I gaze at them in wonder, now at this house of mine.”
यह ईश्वर की कुदरत है कि वे हमारे घर आए हैं; हम हैरानी में कभी उन्हें देखते हैं और कभी अपने घर को देखते हैं।
ग़ालिब ने इस शेर में महबूब के अचानक घर आने पर होने वाले असीम विस्मय और ख़ुशी को बेहद मासूमियत से बयां किया है। शायर की नज़रें बार-बार अपने महबूब के हुस्न और अपने सादा, खस्ताहाल घर के बीच घूमती हैं, मानो उसे अपनी क़िस्मत पर भरोसा ही न हो रहा हो। अपनी बेबसी और महबूब की शान के इस फ़र्क़ को देखते हुए वह इस मुलाक़ात को सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुदा का करिश्मा मान बैठता है।
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