ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं कभी सबा को कभी नामा-बर को देखते हैं

“In separation, it is we who gaze at the door and wall / Looking now towards the morning breeze, now towards the messenger.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

जुदाई के दिनों में हम दरवाज़ों और दीवारों को ताकते रहते हैं, और किसी ख़बर की उम्मीद में कभी सुबह की हवा को तो कभी संदेशवाहक को देखते हैं।

विस्तार

इस शेर में महबूब की जुदाई (हिज्र) में तड़पते आशिक के इंतज़ार और बेचैनी को बेहद सादगी से उकेरा गया है। घर में कैद आशिक कभी सूनी दीवारों और दरवाज़े को तकता है, मानो हर पल किसी आहट की उम्मीद हो। उसकी निगाहें कभी सुबह की ठंडी हवा (सबा) की ओर उठती हैं कि शायद वह महबूब की खुशबू या पैगाम ले आए, तो कभी डाकिया (नामा-बर) का रास्ता देखती हैं। यह शेर बेबसी और उम्मीद के बीच झूलते दिल की वह दास्तान है जो हर आशिक समझ सकता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.