ग़ज़ल

उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए

اس بزم میں مجھے نہیں بنتی حیا کیے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 9 shers· radif: किए

यह ग़ज़ल सामाजिक मर्यादाओं के प्रति अवज्ञा और पारंपरिक धार्मिकता के त्याग के विषयों पर आधारित है। शायर अपनी अटूट निष्ठा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि दिल भले ही बाहरी बाधाओं से डर जाए, लेकिन वे अपनी खिरका और सज्जादा मय के लिए रहन रख देते हैं। अंत में, यह ग़ज़ल एक लंबे जीवन की निरर्थकता पर गहरा चिंतन करती है, यदि वह बिना किसी उद्देश्य के बिताया गया हो।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किए बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किए
उस महफ़िल में, मैं शर्म या हया नहीं कर सका। मुझे बार-बार इशारे होने के बावजूद, मैं वहीं बैठा रहा।
2
दिल ही तो है सियासत-ए-दरबाँ से डर गया मैं और जाऊँ दर से तिरे बिन सदा किए
यह तो बस दिल ही था जो दरबान की सख्ती से डर गया। क्या मैं आपकी पुकार के बिना आपके द्वार से कभी लौटता?
3
रखता फिरूँ हूँ ख़िर्क़ा ओ सज्जादा रहन-ए-मय मुद्दत हुई है दावत आब-ओ-हवा किए
मैं अपनी दरवेशी चादर और नमाज़ की चटाई शराब के लिए गिरवी रखता फिरता हूँ। मुझे बाहरी दुनिया (आब-ओ-हवा) से जुड़े हुए या उसका सत्कार किए हुए बहुत समय हो गया है।
4
बे-सर्फ़ा ही गुज़रती है हो गरचे उम्र-ए-ख़िज़्र हज़रत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किए
अगर ख़िज़्र की सी लंबी उम्र भी मिल जाए तो भी वो बेकार ही गुज़र जाती है, कल ख़िज़्र भी कहेंगे कि हमने क्या किया।
5
मक़्दूर हो तो ख़ाक से पूछूँ कि ऐ लईम तू ने वो गंज-हा-ए-गराँ-माया क्या किए
यदि मुझे शक्ति होती तो मैं मिट्टी से पूछता, 'ऐ नीच, तूने वे अनमोल ख़ज़ाने क्या किए?'
6
किस रोज़ तोहमतें न तराशा किए अदू किस दिन हमारे सर पे न आरे चला किए
शत्रुओं ने हर दिन हम पर इल्ज़ाम गढ़े, और हमारे सिर पर आरे चलाकर हमें लगातार कष्ट पहुँचाया।
7
सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू देने लगा है बोसा बग़ैर इल्तिजा किए
कहीं यह आदत किसी और की संगति में तो नहीं पड़ गई है? वह बिना किसी प्रार्थना के चुंबन देने लगा है।
8
ज़िद की है और बात मगर ख़ू बुरी नहीं भूले से उस ने सैकड़ों वा'दे वफ़ा किए
उसकी ज़िद अपनी जगह है, लेकिन उसका स्वभाव बुरा नहीं है। उसने अनजाने में ही सही, सैकड़ों वादे पूरे किए हैं।
9
'ग़ालिब' तुम्हीं कहो कि मिलेगा जवाब क्या माना कि तुम कहा किए और वो सुना किए
ग़ालिब, तुम खुद ही बताओ कि तुम्हें क्या जवाब मिलेगा। यह सच है कि तुम कहते रहे और वे बस सुनते रहे।
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