“In whose garden has this spectacle's assembly been disrupted, That every jasmine petal now appears as shattered Halabi glass?”
किसके बाग में यह तमाशे की महफिल अस्त-व्यस्त हो गई है, कि चमेली का हर पत्ता अब हलबी शीशे के टुकड़े जैसा लग रहा है।
चमन में किस के ये बरहम हुई है बज़्म-ए-तमाशा कि बर्ग बर्ग-ए-समन शीशा रेज़ा-ए-हलबी है। Chaman mein kis ke ye barham hui hai bazm-e-tamasha ki barg barg-e-saman sheesha reza-e-halabi hai. बगीचे में किसी की महफिल इस कदर उजड़ गई है कि चमेली का हर पत्ता अब कांच के तेज़ टुकड़ों की तरह चुभ रहा है। बरहम का मतलब है बिखरा हुआ या बर्बाद, बज़्म-ए-तमाशा यानी रौनक वाली महफिल, और शीशा रेज़ा-ए-हलबी का मतलब है अलेप्पो शहर का बारीक कांच। मेरे दोस्त, क्या कभी ऐसा हुआ है कि जिसे आप सबसे हसीन समझते थे, वही अचानक आपको दर्द देने लगे? ग़ालिब यहां एक ऐसी ही कैफियत बयां कर रहे हैं। जब दिल के अंदर सब कुछ टूट जाता है, तो बाहर की खूबसूरती भी आंखों को अच्छी नहीं लगती। चमेली का फूल जो अपनी कोमलता के लिए जाना जाता है, ग़ालिब को वो कांच के टुकड़ों जैसा लग रहा है। असल में, ये हमारी अपनी उदासी होती है जो दुनिया के मंज़र बदल देती है। जब कोई बहुत बड़ी खुशी मातम में बदल जाए, तो बाग की हरियाली भी ज़ख्म देने लगती है। जैसे किसी खुशहाल घर में अचानक सन्नाटा छा जाए और वहां की हर चीज़ पराया और तकलीफदेह लगने लगे। ये वैसा ही है जैसे आप किसी पुरानी तस्वीर को देखें जिसे आपने खुद फाड़ दिया हो। वो चेहरा जो कभी सुकून देता था, अब फटे हुए कागज़ की तरह आपकी आंखों में चुभता है। जब रूह ज़ख्मी होती है, तो फूलों की नरमी भी कांच की तरह चुभने लगती है।
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
