ग़ज़ल

शिकवे के नाम से बे-मेहर ख़फ़ा होता है

شکوے کے نام سے بے مہر خفا ہوتا ہے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 13 shers· radif: है

यह ग़ज़ल एक ऐसे प्रेमी की दुर्दशा को दर्शाती है जहाँ महबूब शिकायत का नाम सुनकर ही नाराज़ हो जाता है और शिकायतों का जवाब और अधिक क्रूरता से देता है। प्रेमी का हृदय अनकहे दुखों से भरा होने के बावजूद, वह पाता है कि अपने दर्द को व्यक्त करने से उत्पीड़न और बढ़ जाता है। यह प्रेम के मार्ग को छाले पड़े पैरों से यात्रा करने जितना धीमा और कठिन चित्रित करती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
शिकवे के नाम से बे-मेहर ख़फ़ा होता है ये भी मत कह कि जो कहिए तो गिला होता है
निर्दयी प्रिय शिकायत के नाम से ही नाराज़ हो जाता है। इसलिए यह भी मत कहो कि जो कुछ कहा जाए वह शिकायत बन जाए।
2
पुर हूँ मैं शिकवे से यूँ राग से जैसे बाजा इक ज़रा छेड़िए फिर देखिए क्या होता है
मैं शिकायतों से भरा हुआ हूँ, जैसे कोई वाद्य यंत्र संगीत से भरा होता है। बस ज़रा सा छेड़िए और फिर देखिए क्या होता है।
3
गो समझता नहीं पर हुस्न-ए-तलाफ़ी देखो शिकवा-ए-जौर से सरगर्म-ए-जफ़ा होता है
भले ही वह समझता नहीं, पर उसके 'तलाफ़ी' (जवाब देने के तरीके) की सुंदरता तो देखो। अत्याचार की मेरी शिकायत से वह और अधिक ज़ुल्म करने में लीन हो जाता है।
4
इश्क़ की राह में है चर्ख़-ए-मकोकब की वो चाल सुस्त-रौ जैसे कोई आबला-पा होता है
इश्क़ के मार्ग में तारों भरे आसमान की चाल इतनी धीमी है, जैसे कोई छाले पड़े पैरों वाला व्यक्ति चलता हो।
5
क्यूँ न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बेदाद कि हम आप उठा लाते हैं गर तीर ख़ता होता है
हम अन्याय के बाणों का निशाना क्यों न बनें, जबकि बाण चूक जाने पर भी हम उसे स्वयं उठा लाते हैं।
6
ख़ूब था पहले से होते जो हम अपने बद-ख़्वाह कि भला चाहते हैं और बुरा होता है
अच्छा होता अगर हम शुरू से ही अपने दुश्मन होते। क्योंकि हम भला चाहते हैं, पर होता हमेशा बुरा ही है।
7
नाला जाता था परे अर्श से मेरा और अब लब तक आता है जो ऐसा ही रसा होता है
मेरा विलाप पहले अर्श से भी ऊपर चला जाता था, लेकिन अब, यदि वह केवल होठों तक ही आ पाए, तो यही उसकी पूरी पहुँच या प्रभावशीलता मानी जाती है।
8
ख़ामा मेरा कि वो है बारबुद-ए-बज़्म-ए-सुख़न शाह की मद्ह में यूँ नग़्मा-सरा होता है
मेरा कलम, जो शायरी की महफिल का बारबुद है, राजा की प्रशंसा में इसी तरह गीत गाता है।
9
ऐ शहंशाह-ए-कवाकिब सिपह-ओ-मेहर-अलम तेरे इकराम का हक़ किस से अदा होता है
हे बादशाह, जिसकी सेना सितारों की है और सूरज जिसका झंडा है, आपकी उदारता का हक़ कौन चुका सकता है?
10
सात अक़्लीम का हासिल जो फ़राहम कीजे तो वो लश्कर का तिरे नाल-ए-बहा होता है
यदि सातों क्षेत्रों का समस्त उत्पादन एकत्रित किया जाए, तो वह तुम्हारी सेना की एक आह का मोल होगा।
11
हर महीने में जो ये बद्र से होता है हिलाल आस्ताँ पर तिरे मह नासिया सा होता है
हर महीने जो चाँद पूर्णिमा (बद्र) से घट कर हिलाल (नया चाँद) बनता है, वह आपकी चौखट पर माथे की तरह झुका हुआ प्रतीत होता है।
12
मैं जो गुस्ताख़ हूँ आईन-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी में ये भी तेरा ही करम ज़ौक़-फ़ज़ा होता है
ग़ज़ल गाने के नियमों में मेरी जो गुस्ताख़ी है, यह भी तुम्हारी ही कृपा है जो आनंद को बढ़ाती है।
13
रखियो 'ग़ालिब' मुझे इस तल्ख़-नवाई में मुआ'फ़ आज कुछ दर्द मिरे दिल में सिवा होता है
ग़ालिब, मेरी इस कटु वाणी के लिए मुझे क्षमा कर देना। आज मेरे हृदय में कुछ ज़्यादा ही दर्द हो रहा है।
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