इज़्तिराब-ए-उम्र बे-मतलब नहीं आख़िर कि है — मिर्ज़ा ग़ालिब

इज़्तिराब-ए-उम्र बे-मतलब नहीं आख़िर कि है जुसतुजू-ए-फ़ुर्सत-ए-रब्त-ए-सर-ए-ज़ानू मुझे

“This lifelong restlessness is not without a purpose, after all; / I only seek a moment's respite to rest my head upon my knees.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

जीवन की यह बेचैनी बेमक़सद नहीं है, क्योंकि आख़िरकार मुझे बस इतनी फ़ुरसत की तलाश है कि अपने घुटनों पर सर रख सकूँ।

विस्तार

ग़ालिब यहाँ ज़िंदगी भर की बेचैनी और भागदौड़ के पीछे छुपे एक गहरे और भावुक मक़सद को बयां कर रहे हैं। घुटनों पर सिर रखकर बैठना उर्दू शायरी में तन्हाई, आत्ममंथन और गहरे रंज की निशानी माना जाता है। शायर का कहना है कि उनकी यह सारी बेकली बेमानी नहीं है; वे तो बस ज़माने से इतनी सी मोहलत चाहते हैं कि एक कोने में बैठकर अपने दुखों के साथ सुकून पा सकें।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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