याद-ए-मिज़्गाँ में ब-नश्तर-ए-ज़ार-ए-सौदा-ए-ख़याल — मिर्ज़ा ग़ालिब
“In remembrance of her lashes amid the lancet-grove of fevered thought, in the hour of burning agony I need a hundred flanks at once to toss upon.”
अर्थ
महबूब की पलकों की याद के कारण मेरे ख़्यालों का जुनून नश्तरों का मैदान बन गया है, और इस बेचैनी व तड़प की हालत में करवटें बदलने के लिए मुझे एक साथ सौ पहलू चाहिए।
विस्तार
ग़ालिब यहाँ इश्क़ की बेकरारी और तड़प को बेहद अनोखे अंदाज़ में बयां कर रहे हैं। जब उन्हें महबूब की तीखी पलकों की याद आती है, तो उनके ख्यालों की दुनिया नश्तरों यानी नुकीले काँटों का एक जंगल बन जाती है और दिल में बेचैनी की आग भड़क उठती है। यह तड़प इस कदर बेकाबू है कि बिस्तर पर करवटें बदलते हुए सिर्फ दो पहलू कम पड़ जाते हैं—वे चाहते हैं कि उनके पास एक साथ सौ पहलू हों, ताकि वे अपनी इस असीम बेचैनी को झेल सकें।
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