“The discourse of union, I failed to attain, Now what to call it? A henna-hued bird, with clipped wings, in vain.”
मिलन का विषय हाथ न आया, लेकिन अब उसे मैं क्या कहूँ? मेहंदी के रंग से रंगा हुआ, पर कटे हुए पक्षी की तरह।
मज़मून-ए-वस्ल हाथ न आया मगर उसे / अब ताइर-ए-पर-बुरीदा-ए-रंग-ए-हिना कहूँ मिलन की हकीकत तो समझ में नहीं आई, लेकिन अब मैं महबूब के हाथ की मेहंदी के रंग को एक ऐसा पक्षी कहूँगा जिसके पंख काट दिए गए हों। यहाँ मज़मून का अर्थ विषय या बात है, वस्ल का मतलब मिलन है, ताइर पक्षी को कहते हैं और पर-बुरीदा का मतलब है जिसके पंख कटे हुए हों। [आह] मेरे दोस्त, ज़रा कल्पना कीजिए। आप किसी से मिलने की बहुत कोशिश करते हैं, पर वह लम्हा कभी हकीकत नहीं बन पाता। ग़ालिब कह रहे हैं कि मिलन का वह सुख तो उन्हें नहीं मिला, पर उनके पास एक निशानी रह गई है। वह निशानी है महबूब के हाथों पर रची हुई मेहंदी। वह उस मेहंदी के लाल रंग को एक घायल पक्षी की तरह देखते हैं। जैसे कोई परिंदा उड़ना चाहता हो पर उसके पंख काट दिए गए हों और वह अब बस हथेली पर जम गया है। यह उनकी अधूरी इच्छाओं का एक खूबसूरत मगर दर्दनाक रूप है जो अब कहीं जा नहीं सकता। यह वैसा ही है जैसे किसी सूखे हुए गुलाब को किताब में संभाल कर रखना, जो अपनी खुशबू तो खो चुका है पर अपनी सुंदरता में अब भी थमा हुआ है। जो ख्वाहिशें पूरी नहीं होतीं, वे अक्सर एक खूबसूरत तस्वीर बनकर हमारे पास रह जाती हैं।
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