“O cruel one, do not wish me disgraced by my own belief,Alas, God forbid, that I should call you unfaithful!”
हे ज़ालिम, मेरे संदेह के कारण मुझे शर्मिंदा न कर। हाय, ईश्वर न करे कि मैं तुझे बेवफ़ा कहूँ।
ज़ालिम मिरे गुमाँ से मुझे मुन्फ़'इल न चाह, है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे बेवफ़ा कहूँ। Zaalim mere gumaan se mujhe munfail na chaah. Hai hai khuda-na-karda tujhe bewafa kahoon. ऐ ज़ालिम, मेरे शक की वजह से मुझे शर्मिंदा मत करो। खुदा न करे कि मुझे कभी तुम्हें बेवफा कहना पड़े। यहाँ गुमाँ शब्द का अर्थ है संदेह या मन का विचार, और मुन्फ़इल होने का मतलब है किसी बात पर लज्जित या शर्मिंदा होना। क्या आपने कभी महसूस किया है कि आप किसी पर शक तो कर रहे हैं, पर अंदर ही अंदर आप चाहते हैं कि आप गलत साबित हों? ग़ालिब यहाँ अपने महबूब से यही कह रहे हैं। उनके मन में कुछ कड़वे शक पैदा हो रहे हैं। लेकिन वो अपने महबूब से मिन्नत कर रहे हैं कि मुझे शर्मिंदा मत होने देना। वो नहीं चाहते कि उनका शक सच हो जाए, क्योंकि अगर शक सच निकला, तो उन्हें अपनी पसंद और अपनी मोहब्बत पर शर्म आएगी। वो कह रहे हैं कि मुझे गलत साबित कर दो, मुझे झूठा बना दो, पर खुद बेवफा मत बनो ताकि मेरा भरोसा ज़िंदा रहे। मोहब्बत में अक्सर हम हारना चाहते हैं ताकि हमारा महबूब जीत सके। ये वैसा ही है जैसे हम किसी पुराने दोस्त के बारे में कुछ बुरा सुनें और दुआ करें कि ये सिर्फ एक अफवाह हो, क्योंकि सच का पता चलना खुद के हार जाने जैसा है। मोहब्बत में कभी-कभी खुद का गलत साबित होना ही सबसे बड़ी राहत होती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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