ग़ज़ल

न होगा यक-बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा

نہ ہوگا یک بیاباں ماندگی سے ذوق کم میرا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 7 shers· radif: मेरा

इस ग़ज़ल में शायर के प्रेम-मार्ग में अटूट उत्साह और दुर्गम रास्तों के प्रति अदम्य लगन को दर्शाया गया है। इसमें सांसारिक सुखों से विरक्ति और निरंतर संघर्ष में ही जीवन का वास्तविक अर्थ पाने की बेचैनी व्यक्त हुई है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
न होगा यक-बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा हबाब-ए-मौजा-ए-रफ़्तार है नक़्श-ए-क़दम मेरा
सिर्फ एक रेगिस्तान की थकान से मेरा जोश कम नहीं होगा, क्योंकि मेरे क़दमों का निशान मेरी तेज़ रफ़्तार की लहर पर महज़ एक बुलबुला है।
2
मोहब्बत थी चमन से लेकिन अब ये बे-दिमाग़ी है कि मौज-ए-बू-ए-गुल से नाक में आता है दम मेरा
मुझे कभी बाग़ से बहुत लगाव था, लेकिन अब तबीयत इस कदर बेज़ार हो चुकी है कि फूल की ख़ुशबू के झोंके से भी मेरा दम घुटने लगता है।
3
रह-ए-ख़्वाबीदा थी गर्दन-कश-ए-यक-दर्स-ए-आगाही ज़मीं को सैली-ए-उस्ताद है नक़्श-ए-क़दम मेरा
सोया हुआ रास्ता चेतना का एक सबक भी सीखने को तैयार नहीं था, इसलिए ज़मीन पर मेरे क़दम का निशान उस्ताद के उस तमाचे जैसा है जो उसे जगाने के लिए मारा गया हो।
4
सुराग़-आवारा-ए-अर्ज़-ए-दो-आलम शोर-ए-महशर हूँ पर-अफ़्शाँ है ग़ुबार आँ सू-ए-सहरा-ए-अदम मेरा
मैं दोनों जहानों के विस्तार की खोज में भटकता हुआ क़यामत का शोर हूँ, और मेरी ख़ाक का गुबार अदम (शून्यता) के सहरा के भी उस पार उड़ रहा है।
5
हवा-ए-सुब्ह यक-आलम गरेबाँ चाकी-ए-गुल है दहान-ए-ज़ख़्म पैदा कर अगर खाता है ग़म मेरा
सुबह की हवा से सारे फूल अपना गिरेबान चाक किए हुए हैं; अगर तुझे मेरा ग़म खाना है तो किसी ज़ख़्म का मुँह पैदा कर।
6
न हो वहशत-कश-ए-दर्स-ए-सराब-ए-सत्र-ए-आगाही मैं गर्द-ए-राह हूँ बे-मुद्दआ है पेच-ओ-ख़म मेरा
ज्ञान की मृगतृष्णा की लकीरों से मिलने वाले सबक से परेशान मत हो; मैं तो बस रास्ते की धूल हूँ और मेरे चक्करों या उलझनों का कोई उद्देश्य नहीं है।
7
'असद' वहशत-परस्त-ए-गोशा-ए-तन्हाई-ए-दिल है ब-रंग-ए-मौज-ए-मय ख़म्याज़ा-ए-साग़र है रम मेरा
असद दिल की तन्हाई के कोने में वहशत का पुजारी है; शराब की लहर की तरह मेरी उड़ान बस पैमाने की अंगड़ाई (सीमा) तक ही सीमित है।
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