'ग़ालिब' अपना ये अक़ीदा है ब-क़ौल-ए-'नासिख़' — मिर्ज़ा ग़ालिब

'ग़ालिब' अपना ये अक़ीदा है ब-क़ौल-ए-'नासिख़' आप बे-बहरा है जो मो'तक़िद-ए-'मीर' नहीं

“Ghalib, this is my firm belief, echoing what Nasikh decreed: Truly bereft of art is he who holds no faith in Mir.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

ग़ालिब कहते हैं कि नासिख़ के कहे अनुसार मेरा यह पक्का मानना है कि जो व्यक्ति मीर (तक़ी 'मीर') की शायरी का क़ायल या मुरीद नहीं है, वह वास्तव में किसी हुनर और समझ से वंचित है।

विस्तार

मिर्ज़ा ग़ालिब अपनी शायरी की बुलंदी और अनोखे अंदाज़ पर बेहद नाज़ करते थे, लेकिन इस शेर में वह अपनी सारी 'अना' भुलाकर मीर तक़ी मीर के हुनर के आगे झुक जाते हैं। शायर नासिख़ का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि जो इंसान मीर की शायरी का क़ायल नहीं, वह अदब की समझ और दिल के अहसासों से पूरी तरह महरूम है। यह शेर दिखाता है कि ग़ालिब जैसा बेबाक और ख़ुदपसंद उस्ताद भी सच्चे फन और संजीदगी का कितना गहरा एहतिराम करता था।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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