जब करम रुख़्सत-ए-बेबाकी-ओ-गुस्ताख़ी दे — मिर्ज़ा ग़ालिब
“When grace grants license to boldness and insolence, no fault remains save shame at one's offense.”
अर्थ
जब मेहरबानी स्वयं बेबाकी और गुस्ताख़ी करने की इजाज़त दे दे, तो अपनी ख़ता पर शर्मिंदा होने के सिवा कोई और ख़ता बाकी नहीं रह जाती।
विस्तार
ग़ालिब यहाँ महबूब या खुदा की बेपनाह रहमत और इनायत का एक बेहद ख़ूबसूरत पहलू पेश करते हैं। जब सामने वाला इतना दरियादिल हो जाए कि वह आपकी हर बेबाकी, शोख़ी और गुस्ताख़ी को भी खुले दिल से मंज़ूर कर ले, तो उस वक़्त झिझकना ही सबसे बड़ी भूल बन जाती है। ऐसे असीम प्यार के सामने अपनी कमियों पर शर्मिंदा होते रहना असल में उसकी बख़्शिश और बड़प्पन को न समझने जैसा है, इसलिए बस वही शर्म सबसे बड़ा गुनाह ठहरती है।
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