ग़ज़ल

लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और

لازم تھا کہ دیکھو مرا رستا کوئی دن اور
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 10 shers· radif: और

यह ग़ज़ल महबूब के और कुछ दिन रुकने की तीव्र इच्छा और अकेलेपन के दर्द को बयान करती है। शायर महबूब के दरवाज़े पर अपना माथा घिसते हुए भी अपनी अटूट वफ़ादारी दर्शाता है और प्रलय के दिन मिलने के वादे पर व्यंग्यात्मक सवाल उठाता है। यह ग़ज़ल प्रिय की उपस्थिति के लिए एक मार्मिक गुहार है, जिसमें बेपनाह मोहब्बत और जुदाई का दर्द झलकता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और तन्हा गए क्यूँ अब रहो तन्हा कोई दिन और
तुम्हें कुछ और दिन मेरा इंतज़ार करना चाहिए था। अकेले क्यों गए, अब कुछ और दिन अकेले ही रहो।
2
मिट जाएगा सर गर तिरा पत्थर न घिसेगा हूँ दर पे तिरे नासिया-फ़रसा कोई दिन और
मेरा सर आपके दर पर झुकते-झुकते घिस जाएगा, अगर आपकी दहलीज का पत्थर नहीं घिसता। मैं कुछ और दिन आपके दर पर माथा टेकता रहूँगा।
3
आए हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊँ माना कि हमेशा नहीं अच्छा कोई दिन और
तुम कल ही आए हो और आज ही जाने की बात कर रहे हो। यह माना कि हमेशा रुकना संभव नहीं, पर एक और दिन रुक जाओ।
4
जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे क्या ख़ूब क़यामत का है गोया कोई दिन और
जाते हुए तुम कहते हो कि हम क़यामत के दिन मिलेंगे। क्या ख़ूब, जैसे क़यामत का कोई और साधारण दिन हो।
5
हाँ ऐ फ़लक-ए-पीर जवाँ था अभी आरिफ़ क्या तेरा बिगड़ता जो न मरता कोई दिन और
हे बूढ़े आकाश/भाग्य, आरिफ़ अभी जवान था। यदि वह कुछ दिन और न मरता तो तेरा क्या बिगड़ जाता?
6
तुम माह-ए-शब-ए-चार-दहुम थे मिरे घर के फिर क्यूँ न रहा घर का वो नक़्शा कोई दिन और
तुम मेरे घर के चौदहवीं रात के चाँद थे, तो फिर घर का वो नज़ारा कुछ और दिन क्यों नहीं रहा?
7
तुम कौन से थे ऐसे खरे दाद-ओ-सितद के करता मलक-उल-मौत तक़ाज़ा कोई दिन और
तुम्हारे ऐसे कौन से खरे लेन-देन थे कि मृत्यु का फ़रिश्ता कुछ और दिन की मोहलत माँगता? इसका अर्थ है कि व्यक्ति के लेन-देन इतने खरे नहीं थे कि उसे अधिक जीवन मिलता।
8
मुझ से तुम्हें नफ़रत सही नय्यर से लड़ाई बच्चों का भी देखा न तमाशा कोई दिन और
तुम्हें मुझसे नफ़रत है और नय्यर से लड़ाई भी, ठीक है। लेकिन क्या तुम बच्चों का खेल कुछ और दिन नहीं देख सकते थे?
9
गुज़री न ब-हर-हाल ये मुद्दत ख़ुश ओ ना-ख़ुश करना था जवाँ-मर्ग गुज़ारा कोई दिन और
यह समय, चाहे खुशी में हो या दुख में, किसी भी तरह से व्यतीत नहीं हुआ। हे अकाल मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति! मुझे कुछ और दिन गुज़ारने थे।
10
नादाँ हो जो कहते हो कि क्यूँ जीते हैं 'ग़ालिब' क़िस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और
तुम नादान हो जो पूछते हो कि ग़ालिब क्यों जीवित हैं। तक़दीर में है कि मरने की इच्छा अभी कुछ और दिन रहेगी।
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