ग़ज़ल

क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर

کیوں جل گیا نہ تاب رخ یار دیکھ کر
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 12 shers· radif: कर

यह ग़ज़ल इश्क़ के विरोधाभासी दर्द को बयाँ करती है, जहाँ प्रेमी यह अफ़सोस करता है कि वह महबूब के चमकदार चेहरे को देखकर क्यों भस्म नहीं हो गया, बल्कि अपनी ही तीव्र दृष्टि की शक्ति से जलता है। वह अपनी तीखी आहों के कारण 'आतिश-परस्त' कहलाता है और आम ज़ुल्म के बीच मोहब्बत की इज़्ज़त पर सवाल उठाता है। आशिक़ को क़त्ल करने आ रहे महबूब के हाथ में तलवार देखकर, वह तलवार से नहीं बल्कि तलवार के प्रति रश्क (ईर्ष्या) से मर जाता है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर जलता हूँ अपनी ताक़त-ए-दीदार देख कर
प्रियतम के प्रतापी मुख को देखकर मैं जल क्यों नहीं गया? अब मैं अपनी देखने की शक्ति को देखकर जलता हूँ।
2
आतिश-परस्त कहते हैं अहल-ए-जहाँ मुझे सरगर्म-ए-नाला-हा-ए-शरर-बार देख कर
संसार के लोग मुझे अग्नि-पूजक कहते हैं, जब वे मुझे चिंगारियां बरसाने वाली आहों में लीन देखते हैं।
3
क्या आबरू-ए-इश्क़ जहाँ आम हो जफ़ा रुकता हूँ तुम को बे-सबब आज़ार देख कर
जहाँ क्रूरता सामान्य हो, वहाँ प्रेम की क्या गरिमा है? मैं तुम्हें बिना किसी कारण के पीड़ा में देखकर रुक जाता हूँ।
4
आता है मेरे क़त्ल को पर जोश-ए-रश्क से मरता हूँ उस के हाथ में तलवार देख कर
वह मुझे मारने आता है, लेकिन ईर्ष्या के आवेग में। मैं उसके हाथ में तलवार देखकर ही मर जाता हूँ।
5
साबित हुआ है गर्दन-ए-मीना पे ख़ून-ए-ख़ल्क़ लरज़े है मौज-ए-मय तिरी रफ़्तार देख कर
लोगों का खून शराब की सुराही की गर्दन पर साबित हो गया है; तुम्हारी चाल देखकर शराब की लहर भी काँपती है।
6
वा-हसरता कि यार ने खींचा सितम से हाथ हम को हरीस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार देख कर
अफ़सोस, मेरे प्रिय ने अत्याचार से अपना हाथ खींच लिया है, क्योंकि उन्होंने मुझे उनके कष्टों से मिलने वाले आनंद का लालची देखा।
7
बिक जाते हैं हम आप मता-ए-सुख़न के साथ लेकिन अयार-ए-तबअ-ए-ख़रीदार देख कर
हम अपनी शायरी के साथ खुद भी बिक जाते हैं, लेकिन ऐसा खऱीददार की प्रकृति और स्वभाव को देखने के बाद ही होता है।
8
ज़ुन्नार बाँध सुब्हा-ए-सद-दाना तोड़ डाल रह-रौ चले है राह को हमवार देख कर
पवित्र धागा बाँध लो और अपनी सौ दानों वाली माला तोड़ दो; एक यात्री तभी चलता है जब राह उसे सपाट दिखती है।
9
इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं जी ख़ुश हुआ है राह को पुर-ख़ार देख कर
मेरे पैरों के छालों ने मुझे डरा दिया था, पर आगे का रास्ता काँटों से भरा देखकर मेरा मन प्रसन्न हो गया।
10
क्या बद-गुमाँ है मुझ से कि आईने में मिरे तूती का अक्स समझे है ज़ंगार देख कर
आप मुझसे कितने बदगुमाँ हैं कि मेरे आईने में आप तोते के अक्स को देख कर भी उसे ज़ंगार समझते हैं।
11
गिरनी थी हम पे बर्क़-ए-तजल्ली न तूर पर देते हैं बादा ज़र्फ़-ए-क़दह-ख़्वार देख कर
ईश्वरीय प्रकाश की बिजली हम पर गिरनी चाहिए थी, न कि तूर पर्वत पर। क्योंकि शराब तो पीने वाले की क्षमता देखकर ही दी जाती है।
12
सर फोड़ना वो 'ग़ालिब'-ए-शोरीदा हाल का याद आ गया मुझे तिरी दीवार देख कर
वो ग़ालिब-ए-शोरीदा हाल का सर फोड़ना।
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