क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर — मिर्ज़ा ग़ालिब

क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर जलता हूँ अपनी ताक़त-ए-दीदार देख कर

“Why did I not burn away, seeing the beloved's radiant face? I now burn, seeing my own strength to gaze.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

प्रियतम के प्रतापी मुख को देखकर मैं जल क्यों नहीं गया? अब मैं अपनी देखने की शक्ति को देखकर जलता हूँ।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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