ग़ज़ल
ख़तर है रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-गर्दन न हो जावे
خطر ہے رشتہ الفت رگ گردن نہ ہو جاوے
यह ग़ज़ल गहरे भावनात्मक संबंधों के अंतर्निहित खतरों को उजागर करती है। यह चेतावनी देती है कि प्रेम का बंधन जीवन के लिए घातक कमज़ोरी बन सकता है, और दोस्ती में अत्यधिक अभिमान मित्र को शत्रु में बदल सकता है। शेर स्नेह, संभावित पीड़ा और मानवीय रिश्तों के सहज जोखिमों के बीच नाजुक संतुलन पर विचार करते हैं।
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1
ख़तर है रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-गर्दन न हो जावे
ग़ुरूर-ए-दोस्ती आफ़त है तू दुश्मन न हो जावे
सावधान रहें, प्रेम का बंधन कहीं गर्दन की नस न बन जाए। दोस्ती का अभिमान एक आफ़त है, कहीं ऐसा न हो कि तुम दुश्मन बन जाओ।
2
समझ इस फ़स्ल में कोताही-ए-नश्व-ओ-नुमा 'ग़ालिब'
अगर गुल सर्व के क़ामत पे पैराहन न हो जावे
ग़ालिब, इस मौसम में वृद्धि और विकास की कमी को समझो, यदि फूल सरू के पेड़ की ऊँचाई पर एक वस्त्र न बन पाए।
3
ब-पास-ए-शोख़ी-ए-मिज़्गाँ सर-ए-हर-ख़ार सोज़न है
तबस्सुम बर्ग-ए-गुल को बख़िया-ए-दामन न हो जावे
उसकी चंचल पलकों के सम्मान में, हर काँटे की नोक एक सुई है; कहीं ऐसा न हो कि उसकी मुस्कान गुलाब की पंखुड़ी के दामन की सिलाई बन जाए।
4
जराहत-दोज़ी-ए-'आशिक़ है जा-ए-रहम डरता हूँ
कि रिश्ता तार-ए-अश्क-ए-दीदा-ए-सोज़न न हो जावे
आशिक़ के ज़ख्मों को सीना दया का पात्र है। मुझे डर है कि कहीं सिलाई का धागा सुई की आँख से निकला हुआ आँसुओं का तार न हो।
5
ग़ज़ब शर्म-आफ़रीं है रंग-रेज़ी हा-ए-ख़ुद-बेनी
सफ़ेदी आईने की पम्बा-ए-रौज़न न हो जावे
आत्म-प्रशंसा का यह रंग भरना कितना भयानक शर्मनाक है, कहीं ऐसा न हो कि दर्पण की सफेदी खिड़की के सूती अवरोध में बदल जाए।
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