ग़ज़ल
जुनूँ तोहमत-कश-ए-तस्कीं न हो गर शादमानी की
جنوں تہمت کش تسکیں نہ ہو گر شادمانی کی
इस ग़ज़ल में ग़ालिब जीवन के अंतर्विरोधों और अस्तित्व के संघर्ष का गहरा दार्शनिक विश्लेषण करते हैं। वे बताते हैं कि सांसारिक सुख वास्तव में दिल के ज़ख़्मों को और कुरेदते हैं तथा जीवन की कशमकश से मुक्ति पाना असंभव है, क्योंकि संघर्ष और अशांति ही जीवन का मूल स्वरूप हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
जुनूँ तोहमत-कश-ए-तस्कीं न हो गर शादमानी की
नमक-पाश-ए-ख़राश-ए-दिल है लज़्ज़त ज़िंदगानी की
अगर दीवानगी पर खुशी से सुकून पाने का इल्ज़ाम न लगे, तो ज़िंदगी का सारा मज़ा दिल के ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने जैसा ही है।
2
कशाकश-हा-ए-हस्ती से करे क्या सई-ए-आज़ादी
हुई ज़ंजीर मौज-ए-आब को फ़ुर्सत रवानी की
ज़िंदगी की कशमकश से आज़ाद होने की कोशिश क्या की जाए? पानी की लहर के लिए तो उसका बहना ही उसकी ज़ंजीर बन गया है।
3
पस-अज़-मुर्दन भी दीवाना ज़ियारत-गाह-ए-तिफ़्लाँ है
शरार-ए-संग ने तुर्बत पे मेरी गुल-फ़िशानी की
मरने के बाद भी यह दीवाना बच्चों के लिए तीर्थस्थल बना हुआ है; उनके फेंके हुए पत्थरों से निकली चिंगारियों ने मेरी क़ब्र पर फूल बिखेरने का काम किया है।
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