ग़ज़ल

जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे

جس بزم میں تو ناز سے گفتار میں آوے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: आवे

यह ग़ज़ल महबूब की मनमोहक सुंदरता और दिलकश अंदाज़ की तारीफ़ करती है, जिसकी मौजूदगी हर किसी को मंत्रमुग्ध और स्तब्ध कर देती है। इसमें बताया गया है कि महबूब का किसी भी महफ़िल या बाग़ में नाज़ से आना हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है, यहाँ तक कि प्रकृति की सुंदरता भी उनका अनुसरण करती प्रतीत होती है। शायर अपने गहरे दर्द का इज़हार भी करता है और चाहता है कि ज़ालिम महबूब उसके दुख को पहचाने, शायद उसमें उसे कुछ मज़ा भी आए।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
जिस बज़्म में तू नाज़ से गुफ़्तार में आवे जाँ कालबद-ए-सूरत-ए-दीवार में आवे
जब तुम किसी महफिल में नाज़ से बातें करती हो, तो सभी की जान एक दीवार की सूरत में बेजान हो जाती है, यानी वे स्तब्ध रह जाते हैं। उनकी जान एक दीवार की तरह जड़ हो जाती है।
2
साए की तरह साथ फिरें सर्व ओ सनोबर तू इस क़द-ए-दिलकश से जो गुलज़ार में आवे
यदि तुम अपनी इस मनमोहक चाल से बगीचे में आओ, तो सरू और सनोबर के पेड़ भी साये की तरह तुम्हारे साथ-साथ फिरेंगे।
3
तब नाज़-ए-गिराँ माइगी-ए-अश्क बजा है जब लख़्त-ए-जिगर दीदा-ए-ख़ूँ-बार में आवे
तब आँसुओं का भारी नाज़ उचित है, जब कलेजे के टुकड़े खून बरसाने वाली आँखों में आ जाएँ।
4
दे मुझ को शिकायत की इजाज़त कि सितमगर कुछ तुझ को मज़ा भी मिरे आज़ार में आवे
हे सितमगर, मुझे शिकायत करने की अनुमति दे, ताकि तुझे भी मेरे दुख में कुछ आनंद मिल सके।
5
उस चश्म-ए-फ़ुसूँ-गर का अगर पाए इशारा तूती की तरह आइना गुफ़्तार में आवे
अगर उस जादूगर आँख का इशारा मिले, तो दर्पण तोते की तरह बोलने लगेगा।
6
काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब इक आबला-पा वादी-ए-पुर-ख़ार में आवे
हे प्रभु, प्यास से काँटों की जुबान सूख गई है, जो अत्यधिक सूखे और वीरानेपन को दर्शाता है। काश, कोई छाले-पैर वाला व्यक्ति इस काँटों से भरी घाटी में आ जाए।
7
मर जाऊँ न क्यूँ रश्क से जब वो तन-ए-नाज़ुक आग़ोश-ए-ख़म-ए-हल्क़ा-ए-ज़ुन्नार में आवे
मैं रश्क से क्यों न मर जाऊँ जब वह नाज़ुक बदन जनेऊ के मुड़े हुए घेरे के आगोश में आए?
8
ग़ारत-गर-ए-नामूस न हो गर हवस-ए-ज़र क्यूँ शाहिद-ए-गुल बाग़ से बाज़ार में आवे
यदि धन की लालच सम्मान को नष्ट न करती, तो फूल की सुंदरता बाग़ से बाज़ार में क्यों आती?
9
तब चाक-ए-गरेबाँ का मज़ा है दिल-ए-नालाँ जब इक नफ़स उलझा हुआ हर तार में आवे
हे विलापी हृदय, गरेबान फाड़ने का मज़ा तभी है, जब एक साँस इतनी उलझ जाए कि हर तार में फँसी हुई महसूस हो।
10
आतिश-कदा है सीना मिरा राज़-ए-निहाँ से ऐ वाए अगर मा'रिज़-ए-इज़हार में आवे
मेरा सीना एक छिपे हुए राज़ के कारण आग का घर है। हाय, अगर वह राज़ कभी ज़ाहिर हो जाए।
11
गंजीना-ए-मअ'नी का तिलिस्म उस को समझिए जो लफ़्ज़ कि 'ग़ालिब' मिरे अशआ'र में आवे
ग़ालिब, मेरे शेरों में आने वाले हर लफ़्ज़ को अर्थों के ख़ज़ाने का तिलिस्म समझिए।
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