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नोक-ए-हर-ख़ार से था बस-कि सर-ए-दुज़दी-ए-ज़ख़्म
चूँ नमद हम ने कफ़-ए-पा पे 'असद' दिल बाँधा

So keen each thorn on stealing just a wound, Asad, our heart, like felt, to sole was bound.

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

हर काँटे की नोक ज़ख़्म देने के लिए इतनी तैयार थी कि ऐ असद, हमने अपने दिल को नमद की तरह अपने पैर के तलवे पर बाँध लिया।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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