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ग़ज़ल

हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या

ہوس کو ہے نشاطِ کار کیا کیا
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 13 shers· radif: क्या

यह ग़ज़ल जीवन की क्षणभंगुरता को दर्शाती है, जहाँ मृत्यु के बिना जीवन के आनंद पर सवाल उठाया गया है और हवस के नशे पर विचार किया गया है। शायर महबूब की बनावटी बेरुख़ी और अत्यधिक गुरूर से नाराज़गी व्यक्त करता है, केवल आज़माने वाली उदासीनता के बजाय एक सच्ची और निडर नज़र की कामना करता है।

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1
हवस को है नशात-ए-कार क्या क्या न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या
हवस को अपने कामों में अनगिनत खुशियाँ मिलती हैं। यदि मृत्यु न हो, तो जीवन का क्या मज़ा रहेगा?
2
तजाहुल-पेशगी से मुद्दआ क्या कहाँ तक ऐ सरापा नाज़ क्या क्या
इस बनावटी बेरुखी से तुम्हारा क्या मक़सद है? यह कहाँ तक चलेगा, ऐ सरापा नाज़, और क्या-क्या करोगे?
3
नवाज़िश-हा-ए-बेजा देखता हूँ शिकायत-हा-ए-रंगीं का गिला क्या
मैं अनुचित कृपाएँ (बेजा नवाज़िशें) देखता हूँ, तो रंगीन (भावपूर्ण) शिकायतों का क्या गिला करूँ?
4
निगाह-ए-बे-महाबा चाहता हूँ तग़ाफ़ुल-हा-ए-तमकीं-आज़मा क्या
मैं एक निडर नज़र चाहता हूँ, जो बेझिझक हो। ये ऐसी उपेक्षाएँ या नज़रअंदाज़ियाँ क्या हैं जो केवल मेरे धैर्य और दृढ़ता की परीक्षा लेती हैं?
5
फ़रोग़-ए-शोला-ए-ख़स यक-नफ़स है हवस को पास-ए-नामूस-ए-वफ़ा क्या
एक तिनके के शोल की चमक पल भर की होती है। वासना को वफ़ादारी की इज़्ज़त का क्या ख़याल?
6
नफ़स मौज-ए-मुहीत-ए-बे-ख़ुदी है तग़ाफ़ुल-हा-ए-साक़ी का गिला क्या
हमारी सांस आत्म-विस्मृति के सागर की एक लहर है. साक़ी की लापरवाहियों का क्या गिला करना?
7
दिमाग़-ए-इत्र-ए-पैराहन नहीं है ग़म-ए-आवारगी-हा-ए-सबा क्या
अगर मेरे दिमाग़ में लिबास की ख़ुशबू नहीं है, तो सुबह की हवा की बेवजह भटकन का क्या ग़म?
8
दिल-ए-हर-क़तरा है साज़-ए-अनल-बहर हम उस के हैं हमारा पूछना क्या
हर बूंद का दिल 'मैं सागर हूँ' का उद्घोष है। हम उसी के हैं, तो हमारे बारे में क्या पूछना है?
9
मुहाबा क्या है मैं ज़ामिन इधर देख शहीदान-ए-निगह का ख़ूँ-बहा क्या
पक्षपात क्या है? इधर देखो, मैं ज़ामिन हूँ। तुम्हारी नज़र से शहीद हुए लोगों का ख़ून-बहा क्या होगा?
10
सुन ऐ ग़ारत-गर-ए-जिंस-ए-वफ़ा सुन शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा क्या
ऐ वफ़ा की दौलत लूटने वाले, सुन। टूटे हुए दिल के शीशे की आवाज़ क्या है?
11
किया किस ने जिगर-दारी का दावा शकीब-ए-ख़ातिर-ए-आशिक़ भला क्या
किस ने कभी हिम्मत का दावा किया? एक प्रेमी के दिल में भला कितनी सहनशीलता हो सकती है?
12
ये क़ातिल वादा-ए-सब्र-आज़मा क्यूँ ये काफ़िर फ़ित्ना-ए-ताक़त-रुबा क्या
यह जानलेवा और धैर्य की परीक्षा लेने वाला वादा क्यों है? यह निर्दयी और शक्ति छीनने वाला उपद्रव क्या है?
13
बला-ए-जाँ है 'ग़ालिब' उस की हर बात इबारत क्या इशारत क्या अदा क्या
ऐ ग़ालिब, उसकी हर बात जान के लिए मुसीबत है। उसके लफ्ज़ हों, इशारे हों या उसकी अदा, सब कुछ जानलेवा है।
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