हूँ दाग़-ए-नीम-रंगी-ए-शाम-ए-विसाल-ए-यार
नूर-ए-चराग़-ए-बज़्म से जोश-ए-सहर है आज
“I am the faint ember of union's evening bright,From the lamp of the feast, today bursts forth dawn's light.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
मैं यार के मिलन की शाम का एक धुंधला निशान हूँ। आज महफ़िल के चिराग़ की रोशनी से सुबह का जोश फूट पड़ा है।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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