ग़ज़ल
गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
گلشن میں بندوبست بہ رنگ دگر ہے آج
यह ग़ज़ल एक ऐसे दिन का चित्रण करती है जहाँ जीवन की सामान्य व्यवस्था गहरे दुख और बेचैन तड़प से बाधित हो गई है। शायर का दिल टूटा हुआ है, और बेकाबू आँसू सैलाब की तरह बह रहे हैं, जो असीम वेदना को दर्शाते हैं। इस भावनात्मक उथल-पुथल के बीच, एक गहन, निरंतर प्रतीक्षा है, जिसमें आँखें लगातार तलाश में हैं, एक बदलाव की उम्मीद में।
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1
गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज
क़ुमरी का तौक़ हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज
आज गुलशन में बंदोबस्त कुछ अलग तरह का है। आज क़ुमरी का तौक़ दरवाज़े के बाहर एक घेरा है।
2
आता है एक पारा-ए-दिल हर फ़ुग़ाँ के साथ
तार-ए-नफ़स कमंद-ए-शिकार-ए-असर है आज
हर आह के साथ दिल का एक टुकड़ा निकलता है। आज साँस का धागा असर का शिकार करने वाली कमंद बना हुआ है।
3
ऐ आफ़ियत किनारा कर ऐ इंतिज़ाम चल
सैलाब-ए-गिर्या दरपय-ए-दीवार-ओ-दर है आज
हे आराम, किनारे हो जा और हे व्यवस्था, दूर हट जा। आज आँसुओं का ऐसा सैलाब उमड़ा है कि वह हर दीवार और दरवाज़े को अपनी चपेट में ले रहा है।
4
माज़ूली-ए-तपिश हुई इफ़रात-ए-इंतिज़ार
चश्म-ए-कुशादा हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज
अत्यधिक इंतज़ार के कारण उत्साह की तपिश थम गई है; आज मेरी खुली आँख दरवाज़े के बाहर की कुंडी बन गई है।
5
हैरत-फ़रोश-ए-सद-निगरानी है इज़्तिरार
सर-रिश्ता चाक-ए-जेब का तार-ए-नज़र है आज
इज़्तिरार सौ चौकन्नी निगाहों का विक्रेता है। आज, फटे हुए जेब का धागा ही निगाह का तार है।
6
हूँ दाग़-ए-नीम-रंगी-ए-शाम-ए-विसाल-ए-यार
नूर-ए-चराग़-ए-बज़्म से जोश-ए-सहर है आज
मैं यार के मिलन की शाम का एक धुंधला निशान हूँ। आज महफ़िल के चिराग़ की रोशनी से सुबह का जोश फूट पड़ा है।
7
करती है आजिज़ी-ए-सफ़र सोख़्तन तमाम
पैराहन-ए-ख़सक में ग़ुबार-ए-शरर है आज
सफर की विनम्रता सब कुछ पूरी तरह भस्म कर देती है। आज सूखे घास के लिबास में चिंगारी का गुबार है।
8
ता-सुब्ह है ब-मंज़िल-ए-मक़्सद रसीदनी
दूद-ए-चराग़-ए-ख़ाना ग़ुबार-ए-सफ़र है आज
सुबह तक मंज़िल पर पहुँचना है। आज घर के चिराग़ का धुआँ सफ़र की धूल है।
9
दूर-ऊफ़्तादा-ए-चमन-ए-फ़िक्र है 'असद'
मुर्ग़-ए-ख़याल बुलबुल-ए-बे-बाल-ओ-पर है आज
असद विचारों के बाग से दूर हो गया है। उसका कल्पना का पक्षी आज बिना पंख और परों वाला बुलबुल है।
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