क्या ज़ोहद को मानूँ कि न हो गरचे रियाई
पादाश-ए-अमल की तमा-ए-ख़ाम बहुत है
“Why should I esteem piety, even if devoid of all pretense?For the raw desire for deeds' reward holds too much influence.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
मैं तपस्या को क्यों मानूँ, भले ही उसमें दिखावा न हो। क्योंकि कर्मों के फल की कच्ची इच्छा बहुत अधिक है।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
