ग़ज़ल

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब

ایک ایک قطرے کا مجھے دینا پڑا حساب
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 10 shers· radif: था

यह ग़ज़ल प्रेम और जीवन के अनुभवों की भारी कीमत का विलाप करती है, जहाँ शायर को अपने दिल के खून की हर बूँद का हिसाब देना पड़ा। यह टूटी हुई आशाओं और शोकाकुल इच्छाओं के शहर की बात करती है, जो खंडित सपनों के दर्द को दर्शाती है। ये शेर गहरी निराशा, बलिदान और वफ़ा के भ्रम में भी पाई जाने वाली तीव्र पीड़ा को व्यक्त करते हैं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब ख़ून-ए-जिगर वदीअत-ए-मिज़्गान-ए-यार था
मुझे एक-एक बूंद का हिसाब देना पड़ा, क्योंकि मेरे जिगर का खून मेरे महबूब की पलकों की अमानत था।
2
अब मैं हूँ और मातम-ए-यक-शहर-आरज़ू तोड़ा जो तू ने आइना तिमसाल-दार था
अब मैं केवल एक शहर-भर की इच्छाओं का मातम कर रहा हूँ। तुमने जो आइना तोड़ा था, वह तो प्रतिबिंबों से भरा हुआ था।
3
गलियों में मेरी ना'श को खींचे फिरो कि मैं जाँ-दादा-ए-हवा-ए-सर-ए-रहगुज़ार था
मेरी लाश को गलियों में खींचे फिरो, क्योंकि मैं खुले रास्ते पर रहने की चाहत को समर्पित था।
4
मौज-ए-सराब-ए-दश्त-ए-वफ़ा का न पूछ हाल हर ज़र्रा मिस्ल-ए-जौहर-ए-तेग़ आब-दार था
वफ़ा के रेगिस्तान की मृगतृष्णा रूपी लहर का हाल न पूछो। उसका हर कण तेज़ धार वाली तलवार के जौहर की तरह चमकता था।
5
कम जानते थे हम भी ग़म-ए-इश्क़ को पर अब देखा तो कम हुए प ग़म-ए-रोज़गार था
हम भी प्रेम के दुख को कम ही जानते थे, पर अब जब देखा तो वह कम हो गया और वास्तव में वह रोज़गार का दुख था।
6
किस का जुनून-ए-दीद तमन्ना-शिकार था आईना-ख़ाना वादी-ए-जौहर-ग़ुबार था
किसका देखने का जुनून इच्छा का शिकारी था? दर्पणों का घर मूल तत्व की धूल की घाटी था।
7
किस का ख़याल आइना-ए-इन्तिज़ार था हर बर्ग-ए-गुल के पर्दे में दिल बे-क़रार था
किसका ख़याल इंतज़ार का आइना था? हर गुलाब की पत्ती के परदे में एक बेचैन दिल था।
8
जूँ ग़ुंचा-ओ-गुल आफ़त-ए-फ़ाल-ए-नज़र न पूछ पैकाँ से तेरे जल्वा-ए-ज़ख़्म आश्कार था
कली और फूल की तरह, अशुभ दृष्टि की आफ़त के बारे में मत पूछो। तुम्हारे तीर के पैकाँ से घाव का सौंदर्य प्रकट हो रहा था।
9
देखी वफ़ा-ए-फ़ुर्सत-ए-रंज-ओ-नशात-ए-दहर ख़म्याज़ा यक-दराज़ी-ए-उम्र-ए-ख़ुमार था
मैंने दुनिया के दुख और सुख की स्थिर क्षणभंगुरता देखी। इसका परिणाम जीवन का एक लंबा और अकेला खुमार था।
10
सुब्ह-ए-क़यामत एक दुम-ए-गुर्ग थी 'असद' जिस दश्त में वो शोख़-ए-दो-आलम शिकार था
असद, जिस दश्त में वह दोनों जहानों का दिलकश शिकार कर रहा था, वहाँ क़यामत की सुबह सिर्फ़ एक भेड़िये की दुम थी।
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