ग़ज़ल
चाक की ख़्वाहिश अगर वहशत ब-उर्यानी करे
چاک کی خواہش اگر وحشت ب-عریانی کرے
यह ग़ज़ल दिल की गहरी पीड़ा और तीव्र भावनात्मक अभिव्यक्ति को दर्शाती है, जहाँ घाव सुबह की तरह खुलकर ज़ाहिर होते हैं। यह महबूब की विस्मयकारी उपस्थिति की सराहना करती है, जो इतनी मनमोहक है कि दिल की धारणा को आश्चर्य के एक क्षेत्र में बदल देती है। इस विस्मय के बीच, दिल अपने टूटने से भी गहरी थकान व्यक्त करता है, अपने नाज़ुक, भारी अस्तित्व के अंत की लालसा करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
चाक की ख़्वाहिश अगर वहशत ब-उर्यानी करे
सुब्ह के मानिंद ज़ख़्म-ए-दिल गरेबानी करे
यदि दीवानगी फाड़ने की इच्छा रखती है, जबकि वह खुद नग्न है और उसके पास फाड़ने को कुछ नहीं है, तो सुबह की तरह, दिल का घाव अपनी ही गिरेबान फाड़ ले।
2
जल्वे का तेरे वो 'आलम है कि गर कीजे ख़याल
दीदा-ए-दिल को ज़ियारत-गाह-ए-हैरानी करे
तेरे जलवे का वो आलम है कि अगर उसका ख़याल किया जाए, तो दिल की आँख हैरानी की ज़ियारत-गाह बन जाती है।
3
है शिकस्तन से भी दिल नौमीद या-रब कब तलक
आबगीना कोह पर अर्ज़-ए-गिराँ-जानी करे
मेरा दिल तो टूटने से भी नाउम्मीद है, या रब, कब तक? कब तक यह नाजुक शीशा पहाड़ पर अपनी जान की मज़बूती दिखाता रहेगा?
4
मय-कदा गर चश्म-ए-मस्त-ए-नाज़ से पावे शिकस्त
मू-ए-शीशा दीदा-ए-साग़र की मिज़्गानी करे
अगर शराबख़ाना उसकी गर्वपूर्ण, मदभरी नज़र से हार जाता है, तो शीशे के महीन रेशे (बाल) शराब के प्याले की आँख की पलकें बन जाएँगे।
5
ख़त्त-ए-आरिज़ से लिखा है ज़ुल्फ़ को उल्फ़त ने 'अह्द
यक-क़लम मंज़ूर है जो कुछ परेशानी करे
उल्फ़त (प्रेम) ने आरिज़ (गाल) की रेखा से ज़ुल्फ़ों (बालों) के साथ एक अहद (समझौता) लिखा है। ज़ुल्फ़ें (बाल) जो कुछ भी परेशानी पैदा करें, वह पूरी तरह से मंज़ूर है।
6
हाथ पर गर हाथ मारे यार वक़्त-ए-क़हक़हा
किर्मक-ए-शब-ताब-आसा मह पर-अफ़्शानी करे
अगर यार हँसते वक़्त हाथ पर हाथ मारे, तो वह जुगनू की तरह चाँद पर रोशनी बिखेरेगी।
7
वक़्त उस उफ़्तादा का ख़ुश जो क़नाअ'त से असद
नक़्श-पा-ए-मोर को तख़्त-ए-सुलैमानी करे
हे असद, उस विनम्र व्यक्ति का भाग्य धन्य है जो संतोष से चींटी के पदचिह्न को सुलेमानी सिंहासन बना दे।
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