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है शिकस्तन से भी दिल नौमीद या-रब कब तलक आबगीना कोह पर अर्ज़-ए-गिराँ-जानी करे

My heart despairs even of shattering, O Lord, how long,Must fragile glass on a mountain prove its life so strong?

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

मेरा दिल तो टूटने से भी नाउम्मीद है, या रब, कब तक? कब तक यह नाजुक शीशा पहाड़ पर अपनी जान की मज़बूती दिखाता रहेगा?

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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